मिथिला — विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने जाने वाले दलित छात्र आमतौर पर यह उम्मीद रखते हैं कि वे अपने देश की दमनकारी जातिगत व्यवस्था और पदानुक्रम से दूर एक निष्पक्ष माहौल में रह सकेंगे। लेकिन सीमाओं के पार जाने के बावजूद उनकी यह उम्मीद पूरी नहीं हो पा रही है। विदेशों में भी वे खुद को उसी जातिवादी मानसिकता और भेदभाव के घेरे में पा रहे हैं।
राधेश्याम जाधव की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों में मौजूद प्रभुत्वशाली जाति के प्रवासी समुदाय ने अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फैला दिया है। इस कारण से दलित विद्यार्थियों को विदेशी विश्वविद्यालयों के क्लासरूम और सामाजिक परिवेश में भी जाति आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। जिस दमनकारी व्यवस्था से वे बचना चाहते थे, वह सरहद पार भी उनके सामने आ रही है।
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